Class 9 Sanskrit Chapter 5 Hindi translation

Class 9 Sanskrit Chapter 5 Hindi translation

Class 9 Sanskrit Chapter 5 Hindi translation, संस्कृत साहित्य में नीति-ग्रन्थों की समृद्ध परम्परा है। इनमें सारगर्भित और सरल रूप में नैतिक शिक्षाएँ दी गई हैं, जिनका उपयोग करके मनुष्य अपने  जीवन को सफल और समृद्ध बना सकता है। ऐसे ही  मनोहारी और बहुमूल्य सुभाषित यहाँ संकलित हैं, जिनमें सदाचरण की महत्ता, प्रियवाणी की आवश्यकता, परोपकारी पुरुष का स्वभाव, गुणार्जन की प्रेरणा, मित्रता का स्वरूप  और उत्तम पुरुष के सम्पर्क से होने वाली शोभा की प्रशंसा और सत्संगति की महिमा आदि विषयों का प्रतिपादन किया गया है।

पञ्चमः पाठः

सूक्तिमौक्तिकम् (सूक्तिरूपी मोती)

(1) Class 9 Sanskrit Chapter 5 Hindi translation

वृत्तं यत्नेन संरक्षेद् वित्तमेति च याति च।

अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः॥ मनुस्मृतिः

अन्वयः

वत्तं यत्नेन संरक्षेद वित्तं च एति च याति । वित्ततः (क्षीण:) तु अक्षीणः (किंत), वृत्ततः क्षीण: हतः हतः।

कठिन शब्दार्थ

वृत्तम् = आचरण, चरित्र। यत्नेन = प्रयत्नपूर्वक । संरक्षेद् = रक्षा करनी चाहिए। वित्तम् = धन, ऐश्वर्य । एति = आता है। याति = जाता है। अक्षीणः = नष्ट न हुआ। हतः = नष्ट हुआ।

प्रसङ्ग

प्रस्तुत श्लोक हमारी संस्कृत की पाठ्यपुस्तक शेमुषी’ (प्रथमो भागः) के सूक्तिमौक्तिकम्’ नामक पाठ से संकलित किया गया है। इस श्लोक का मूलग्रन्थ मनुस्मृति’ नामक स्मृति-ग्रन्थ है जिसमें मनुष्य को सदाचार की शिक्षा देते हुए मनु कहते हैं-

हिन्दी अनुवाद

मनुष्य को सदाचार (सच्चरित्र) की दृढ़तापूर्वक रक्षा करनी चाहिए अर्थात सदैव सदाचार की रक्षा में प्रयत्नशील रहना चाहिए। धन तो अस्थिर होता है। अर्थात् आता-जाता रहता है। धन के क्षीण (कम) होने से मनुष्य क्षीण नहीं होता अर्थात् निर्धन नहीं होता अपितु सदाचार से क्षीण (हीन) होने पर निश्चय ही उसका विनाश हो जाता है।

 

(2) Class 9 Sanskrit Chapter 5 Hindi translation

श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्।

आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ॥ विदुरनीतिः

अन्वयः

धर्मसर्वस्वं श्रूयताम् च श्रुत्वा एव अवधार्यताम्। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।

कठिन शब्दार्थ

धर्मसर्वस्वम् = धर्म (कर्तव्यबोध) का सब कुछ। श्रूयताम् = सुनिए। अवधार्यताम् = धारण कीजिए। आत्मनः = स्वयं से। प्रतिकूलानि = विपरीत, अनुकूल नहीं। परेषाम् = दूसरों के। न समाचरेत् = नहीं करना चाहिए।

प्रसङ्ग

हमारी पाठ्यपुस्तक शेमुषी’ (प्रथमोभागः) के सूक्तिमौक्तिकम्’ नामक पाठ से संकलित यह श्लोक महात्मा विदुर रचित विदुरनीति:’ नामक नीति-ग्रन्थ से लिया गया। है जिसमें विदुर ने मानव धर्म तथा व्यवहार की शिक्षा देते हुए कहा है-

हिन्दी अनुवाद

मानव को धर्म का सार सुनना चाहिए और उसे सनकर मन में धारण (ग्रहण) करना चाहिए तथा स्वयं के प्रतिकूल (अप्रिय) आचरण दूसरों के प्रति नहीं करना जाहिए। अर्थात जो व्यवहार तथा कार्य हमें स्वयं को प्रिय  नहीं लगता, वह व्यवहार हम दूसरों के साथ भी नहीं करना चाहिए।

 

यह भी पढ़ें

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Class 9 Sanskrit Chapter 2 स्वर्णकाकः

Class 9 Sanskrit Chapter 3 गोदोहनम्

Class 9 Sanskrit Chapter 4 कल्पतरुः

 

(3) Class 9 Sanskrit Chapter 5 Hindi translation

प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।

तस्माद् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ।। चाणक्यनीतिः

अन्वयः

सर्व जन्तवः प्रियवाक्यप्रदानेन तष्यन्ति। तस्मात् (सर्वे:) तदेव वक्तव्यम् वचने का दरिद्रता।

कठिन शब्दार्थ

जन्तवः = प्राणी। प्रियवाक्यप्रदानेन = मधुर वचन बोलने से। तुष्यन्ति = सन्तुष्ट होते हैं। तदेव = उसी प्रकार से। वक्तव्यम् = कहना चाहिए।

प्रसङ्ग

हमारी पाठ्यपुस्तक शेमुषी’ (प्रथमोभागः) के सूक्तिमौक्तिकम्’ नामक पाठ में संग्रहित प्रस्तत श्लोक चाणक्यनीति’ नामक मूल पुस्तक से चयनित किया गया है। इसमें मधुरभाषिता वाणी के महत्त्व को प्रकट करते हुए कौटिल्य चाणक्य कहते हैं-

हिन्दी अनुवाद

इस संसार में मधुर वचन बोलने से सभी प्राणी प्रसन्न होते हैं अर्थात् प्राणिमात्र को प्रिय वचनों से अनुकूल रखा जाता है। तब तो प्रत्येक को प्रिय वचन ही बोलने चाहिए, क्योंकि बोलने में कोई दरिद्रता (निर्धनता) नहीं आती।

 

(4) Class 9 Sanskrit Chapter 5 Hindi translation

पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः

स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः ।

नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः

परोपकाराय सतां विभूतयः॥ सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

अन्वयः

नद्यः स्वयमेव अम्भः न पिबन्ति वृक्षाः फलानि स्वयं न खादन्ति। वारिवाहा: सस्यं खलु न अदन्ति (एवं) सतां विभूतयः परोपकाराय (भवन्ति, न तु आडम्बराय)।

कठिन शब्दार्थ

नद्यः = नदियाँ। अम्भः = जल। न पिबन्ति = नहीं पीती हैं। न खादन्ति = नहीं खाते हैं। वारिवाहाः = जल वहन करने वाले बादल। सस्यम् = फसलों (धान्य) को। न अदन्ति = नहीं खाते हैं। सताम् = सज्जनों की। विभूतयः = सम्पत्तियाँ।

प्रसङ्ग

प्रस्तुत पद्य हमारी संस्कृत की पाठ्यपुस्तक शेमुषी’ (प्रथमोभागः) के सूक्तिमौक्तिकम्’ नामक पाठ से उद्धत है। मूलतः प्रकृत श्लोक सुभाषितरत्नभाण्डागारम्’ नामक ग्रन्थ से अवतरित है। इसमें परोपकार’ रूपी महान् गुण, पुण्यकार्य की महिमा का वर्णन किया जा रहा है।

हिन्दी अनुवाद

नदियाँ अपना जल स्वयं ही नहीं पीतीं। वृक्ष (वनस्पतियाँ) अपने फल स्वयं नहीं खाते। बादल सस्यों (कृष कम द्वारा उगाई फसलों) को कभी नहीं खाते अर्थात् यह सब इनके परोपकारात्मक स्वभाव के कारण है। इसी प्रकार सज्जनों (श्रेष्ठ लोगों) की सम्पत्तियाँ (साधन) भी परोपकार के लिए ही होता है, स्वार्थ के लिए नहीं।

 

(5) Class 9 Sanskrit Chapter 5 Hindi translation

गुणेष्वेव हि कर्तव्यः प्रयत्नः पुरुषैः सदा।

गुणयुक्तो दरिद्रोऽपि नेश्वरैरगुणैः समः॥ मृच्छकटिकम्

अन्वयः

पुरुषैः सदा हि गुणेषु एव प्रयलः कर्त्तव्यः। (यतः)  गुणयुक्तः, दरिद्रः अपि, अगुणैः (युक्तैः) ईश्वरैः समः न। (अपितु श्रेष्ठः भवति)।

कठिन शब्दार्थ

गुणेषु = गुणों को ग्रहण करने में। कर्त्तव्यः = करना चाहिए। दरिद्रः = निर्धन । अगुणैः = गुणहीनों से। समः = समान। ईश्वरैः = धनवानों के।

प्रसङ्ग

महाकवि शूद्रक द्वारा रचित मृच्छकटिकम्’ नामक नाट्यग्रन्थ से संग्रहित तथा शेमुषी’ के प्रथम भाग के सूक्तिमौक्तिकम्’ नामक पाठ में चयनित प्रस्तुत श्लोक में ‘गुणग्राहयता’ में प्रयासरत रहने की आवश्यकता बताई जा रही है।

हिन्दी अनुवाद

मनुष्य को सदा गुणों को ग्रहण (धारण) करने में ही प्रयत्न करना चाहिए। क्योंकि संसार में गुणों से युक्त निर्धन व्यक्ति भी गुणों से हीन-धनी व्यक्तियों से बढ़कर (श्रेष्ठ) होता है अर्थात् गुणहीन निर्धन व्यक्ति ही उससे श्रेष्ठ होता है।

 

(6) Class 9 Sanskrit Chapter 5 Hindi translation

आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण

लध्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात्।

दिनस्य पूर्वार्द्धपरार्द्धभिन्ना

छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्॥ नीतिशतकम्

अन्वयः

दिनस्य पूर्वार्द्धपरार्द्धभिन्ना छाया इव खलसज्जनानां  मैत्री—आरम्भगुर्वी (पश्चात् च) क्रमेणक्षयिणी, (तथा च) पुरा लध्वी पश्चात् च वृद्धिमती (भवति)।

कठिन शब्दार्थ

खलसज्जनानाम् = दुर्जन और सज्जनों की। मैत्री = मित्रता। पूर्वार्द्ध = दोपहर से पहले। परार्द्ध = दोपहर के बाद। आरम्भगुर्वी = आरम्भ में लम्बी। क्रमेण = क्रमश:। क्षयिणी = क्षीण होने वाली, घटती स्वभाव वाली। पुरा = पहले। लध्वी = छोटी। बुद्धिमती = लम्बी होती हुई।

प्रसङ्ग

मूलतः  महाकवि भर्तृहरिरचित नीतिशतकम्’ नामक पुस्तक से संग्रहित तथा शेमुषी’ के सूक्तिमौक्तिकम्’ नामक पाठ में सम्मिलित प्रस्तुत श्लोक में दुर्जन तथा सज्जन की मैत्री के विषय में प्रकृतिपरक उदाहरण के द्वारा भेद दिखाया गया है।

हिन्दी अनुवाद

दुर्जन और सज्जनों की मित्रता दिन के पूर्वार्ध तथा परार्ध (दोपहर पूर्व तथा दोपहर पश्चात्) की छाया की भाँति अलग-अलग स्थिति वाली होती है। दुर्जन की मित्रता तो मध्याहन से पूर्व तथा मध्याहन तक व्याप्त छाया के समान होती है जो आरम्भ में बड़ी (धनी) तथा उत्तरोत्तर क्रम से क्षीण (कम) होती हुई समाप्त हो जाता है। जबकि सज्जन की मित्रता मध्यान से पश्चात की छाया के समान होती है जो आरम्भ में कम (लघ्वी) तथा (क्रमश:) उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है। यही दोनों की मित्रता में भेद है।

 

(7) Class 9 Sanskrit Chapter 5 Hindi translation

यत्रापि कुत्रापि गता भवेयु-

हंसा महीमण्डलमण्डनाय।

हानिस्तु तेषां हि सरोवराणां

येषां मरालैः सह विप्रयोगः॥ भामिनीविलासः

अन्वयः

हंसाः महीमण्डलमण्डनाय यत्र अपि कुत्र अपि गताः भवेयुः (तथा भूते) हानिः तु तेषां सरोवराणां हि (भवति) येषां मरालैः सह (तेषां) विप्रयोगः (भवति)।

कठिन शब्दार्थ

महीमण्डलमण्डनाय = पृथ्वी को सुशोभित करने के लिए। गताः = गए हुए। सरोवराणाम् – सरोवरों (तालाबों) की। मरालैः = हंसों से। विप्रयोगः = वियोग, अलग होना।

प्रसङ्ग

पण्डितराज जगन्नाथ रचित भामिनीविलासः नामक ग्रन्थ से संकलित प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्यपुस्तक शेमुषी (प्रथमोभागः) में सूक्तिमौक्तिकम् नामक पाठ से उद्धृत है। इसमें गुणी (उत्तम) पुरुषों के महत्त्व को प्रतिपादित किया गया है।

हिन्दी अनुवाद

हंस, पृथ्वी की शोभा बढ़ाने को जहाँ कहीं भी चले गए हों, इसमें हानि तो उन सरोवरों (तालाबों) की ही होती है जिन्हें छोड़कर हंस चले गए अर्थात् शोभाकारक हंसों से जिनका बिछुराव हो गया।

 

(8) Class 9 Sanskrit Chapter 5 Hindi translation

गुणा गुणज्ञेषु गुणा भवन्ति

ते निर्गुणं प्राप्य भवन्ति दोषाः।

आस्वाद्यतोयाः प्रवहन्ति नद्यः

समुद्रमासाद्य भवन्त्यपेयाः॥ हितोपदेशः

अन्वयः

गुणाः गुणज्ञेषु (एव) गुणाः भवन्ति, ते (गुणाः) निर्गुणं प्राप्य दोषाः भवन्ति। (यथा) नद्यः आस्वाद्यतोयाः (सति) प्रवहन्ति (किंतु) (ताः एव) समुद्रं आसाद्य अपेयाः  भवन्ति।

कठिन शब्दार्थ

गुणज्ञेषु = गुणों को जानने वालों में। निर्गुणम् = गुणहीन को। प्राप्य = प्राप्त करके । आस्वाद्यतोयाः = स्वादयुक्त जलवाला। प्रवहन्ति = बहती हैं। आसाद्य = पाकर। अपेयाः = न पीने योग्य।

प्रसङ्ग

नारायण पण्डित द्वारा रचित लोकप्रिय ग्रन्थ हितोपदेश से समाहृत प्रस्तुत श्लोक हमारी संस्कृत की  पाठ्यपुस्तक शेमुषी प्रथमोभागः के सूक्तिमौक्तिकम् नामक पाठ में संगृहित है। यहाँ ‘गुण  व गुणज्ञ’ के सम्बन्ध पर प्रकाश डाला जा रहा है।

हिन्दी अनुवाद

गुण, तभी तक गुणरूप में रहते हैं जब तक वे गुणज्ञ (गुणग्राही) जनों में होते हैं। वही गुण निर्गुण पात्र में पहुंचकर दोषों का रूप ग्रहण कर लेते हैं। अर्थात् मूर्खों में आकर वे ही गुण दोष बन जाते हैं। जैसे नदियों का स्वादिष्ट (पेय) जल समुद्र में पहुँचकर अपेय अर्थात् न पीने योग्य (खारी) बन जाता है। सारा भेद संसर्ग का है।

 

पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. एकपदेन उत्तरं लिखत-

(एक पद में उत्तर लिखिए)

(क) वित्ततः क्षीणः कीदृशः भवति?

(धन से क्षीण कैसा होता है?)

उत्तरम्- अक्षीणः।

 

(ख) कस्य प्रतिकूलानि कार्याणि परेषां न समाचरेत्?

(किसके प्रतिकूल कार्य दूसरों के साथ आचरण नहीं करने चाहिए?)

उत्तरम्- आत्मनः।

 

(ग) कुत्र दरिद्रता न भवेत्?

(कहाँ दरिद्रता नहीं होनी चाहिए?)

उत्तरम्- वचने।

 

(घ) वृक्षाः स्वयं कानि न खादन्ति?

(वृक्ष स्वयं क्या नहीं खाते हैं?)

उत्तरम्- फलानि।

 

(ङ) का पुरा लघ्वी भवति?

(क्या पहले छोटी (कम) होती है?)

उत्तरम्- परार्द्धस्य छाया/सज्जनानां मैत्री।

 

प्रश्न 2. NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit

अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत-

(क) यत्नेन किं रक्षेत् वित्तं वृतं वा?

(प्रयत्नपूर्वक किसकी रक्षा करनी चाहिए, धन की अथवा चरित्र की?)

उत्तर- यत्नेन वृत्तं रक्षेत्।

(प्रयत्नपूर्वक आचरण (चरित्र) की रक्षा करनी चाहिए।)

 

(ख) अस्माभिः कीदृशं आचरणं न कर्त्तव्यम्? (अस्माभिः किं न समाचरेत्?)

(हमारे द्वारा किस प्रकार का आचरण नहीं किया जाना चाहिए?)

उत्तर- अस्माभिः आत्मनः प्रतिकूलं न समाचरेत्।

(हमारे द्वारा स्वयं के विपरीत आचरण नहीं करना चाहिए।)

 

(ग) जन्तवः केन तुष्यन्ति?

(प्राणी किस से सन्तुष्ट होते हैं?)

उत्तर- जन्तवः प्रियवाक्यप्रदानेन तष्यन्ति ।

(प्राणी मधुर वचन बोलने से सन्तुष्ट होते हैं।)

NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit

(घ) सज्जनानां मैत्री कीदृशी भवति?

(सज्जनों की मित्रता कैसी होती है?)

उत्तर- सज्जनानां मैत्री दिनस्य परार्ध छाया इव आरम्भे लघ्वी पश्चात् च गुर्वी भवति।

(सज्जनों की मित्रता दिन के परार्ध (मध्याहन पश्चात) की छाया के समान आरम्भ में छोटी और बाद में वृद्धि को प्राप्त करने वाली होती है।)

 

(ङ) सरोवराणां हानिः कदा भवति?

(सरोवरों की हानि कब होती है?)

उत्तर- यदा हंसाः तान् परित्यज्य अन्यत्र गच्छन्ति ।

(जब हंस उनको छोडकर अन्यत्र चले जाते हैं।

 

प्रश्न 3. NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit

‘क’ स्तम्भे विशेषणानि ‘ख’ स्तम्भे च विशेष्याणि दत्तानि, तानि यथोचितं योजयत-

‘क’ स्तम्भः                             ‘ख’ स्तम्भः

(क) आस्वाद्यतोयाः            (1) खलानां मैत्री

(ख) गुणयुक्तः                      (2) सज्जनानां मैत्री

(ग) दिनस्य पूर्वार्द्धभिन्ना   (3) नद्यः

(घ) दिनस्य परार्द्धभिन्ना   (4) दरिद्रः

उत्तर-

‘क’ स्तम्भः ‘ख’ स्तम्भः

(क) आस्वाद्यतोयाः             (3) नद्यः

(ख) गुणयुक्तः                      (4) दरिद्रः

(ग) दिनस्य पूर्वार्द्धभिन्ना    (1) खलानां मैत्री

(घ) दिनस्य पराद्धभिन्ना     (2) सज्जनानां मैत्री

 

प्रश्न 4. NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit

अधोलिखितयोः श्लोकद्वयोः आशयं हिन्दीभाषया आङ्ग्लभाषया वा लिखत-

(क)

आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण

लाध्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात्

दिनस्य पूर्वार्द्धपरार्द्धभिन्ना

छायेव मैत्री खलसज्जनानाम् ।

(ख)

प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।

तस्मात्तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ॥

उत्तर- नोट-उपयुक्त दोनों श्लोकों का आशय पूर्व में दिए गये हिन्दी अनुवाद को देखकर लिखिए।

 

प्रश्न 5. NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit

अधोलिखितपदेभ्यः भिन्नप्रकृतिकं पदं चित्वा लिखत-

(क) वक्तव्यम्, कर्त्तव्यम्, सर्वस्वम्, हन्तव्यम्।

उत्तर- सर्वस्वम्।

(ख) यत्नेन, वचने, प्रियवाक्यप्रदानेन, मरालेन।

उत्तर- वचने।

(ग) श्रृयताम्, अवधार्यताम्, धनवताम्, क्षम्यताम्।

उत्तर- धनवताम्।

(घ) जन्तवः, नद्यः, विभूतयः, परितः।

उत्तर- परितः।

 

प्रश्न 6. NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit

स्थूलपदान्यधिकृत्य प्रश्नवाक्यनिर्माणं करुत-

(क) वृत्ततः क्षीणः हतः भवति।

उत्तर- कस्मात् क्षीणः हतः भवति?

(ख) धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा अवधार्यताम् ।

उत्तर- कम् श्रुत्वा अवधार्यताम्?

(ग) वृक्षाः फलं न खादन्ति।

उत्तर- के फलं न खादन्ति?

(घ) खलानाम् मैत्री आरम्भगर्वी भवति ।

उत्तर- केषाम् मैत्री आरम्भगुर्वी भवति?

 

प्रश्न 7. NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit Shemushi

अधोलिखितानि वाक्यानि लोट लकारे परिवर्तयत-

यथा-

सः पाठं पठति।     सः पाठं पठतु।

उत्तर-

(क) नद्यः आस्वाद्यतोयाः सन्ति।

नद्यः आस्वाद्यतोयाः सन्तु।

(ख) सः सदैव प्रियवाक्यं वदति।

सः सदैव प्रियवाक्यं वदतु।

(ग) त्वं परेषां प्रतिकूलानि न समाचरसि

त्वं परेषां प्रतिकूलानि न समाचर।

(घ) ते वृतं यत्नेन संरक्षन्ति।

ते वृतं यत्नेन संरक्षन्तु।

(ङ) अहम् परोपकाराय कार्यं करोमि।

अहं परोपकाराय कार्य करवाणि।

 

परियोजनाकार्यम् Class 9 Sanskrit Solutions

प्रश्न (क) परोपकारविषयकं श्लोकद्वयं लिखत-

उत्तर-

(i) अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।

     परोपकारः पुण्याय, पापाय परपीडनम् ।।

(ii) परोपकाराय वहन्ति नद्यः, परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः।

      परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम् ।।

 

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit लघूत्तरात्मकप्रश्नाः

प्रश्न 1. कस्मात् हतो हतः?

उत्तर- वृत्ततः क्षीण: हतो हतः।

प्रश्न 2. किं श्रुत्वा अवधार्यताम्?

उत्तर- धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा अवधार्यताम्।

प्रश्न 3. परेषां कथं न समाचरेत्?

उत्तर- आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ।

प्रश्न 4. प्रियवाक्यप्रदानेन के तुष्यन्ति?

उत्तर- प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे जन्तवः तुष्यन्ति ।

प्रश्न 5.  के स्वयं फलानि न खादन्ति?

उत्तर- वृक्षाः स्वयं फलानि न खादन्ति।

प्रश्न 6.  सतां विभूतयः कस्मै भवन्ति।

उत्तर- सतां विभूतयः परोपकाराय भवन्ति।

प्रश्न 7. पुरुषैः सदा केषु प्रयत्नः कर्तव्यः?

उत्तर- पुरुषैः सदा गुणेषु प्रयत्नः कर्तव्यः।

प्रश्न 8. गुणाः कुत्र दोषाः भवन्ति?

उत्तर- गुणाः निर्गुणं प्राप्य दोषाः भवन्ति।

 

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